Monday, 24 November 2014

परिंदो को

आकाश में चंद परिंदो को,जब उड़ता देखा करता हूँ
कुछ आहें सी भर लेता हूँ,कुछ तारीफें कर लेता हूँ।
कुछ सोच के ही रह जाता हूँ,कुछ पुलाव खयाली पकाता हूँ,
कुछ लम्बी लम्बी हाँक मन में,यूं मंद मंद मुस्काता हूँ।
नाप के ऊंचाई नभ की फिर धरती पर आ जाता हूँ ,
पर कल्पना के क़तर के सवयं,सवयं को ढांढस बंधाता हूँ।
की सपने तो सपने होते है,इन्हें देखे वाले खोते है ,
जीवन का सच नहीं उड़ान मे,जीवन यतार्थ है घिसने मे,
हर रोज की भागा दौड़ी मे,इस बाज़ार मे पिसने मे।
फिर भी सपनो की झील मे,कुछ कंकड़ फैका करता हूँ ,
आकाश मे चंद परिंदो को जब उड़ता देखा करता हूँ।       

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